Женские персонажи "Игры престолов" говорят в три раза меньше, чем мужские. Об этом свидетельствуют результаты подсчетов, проведенных исследователями сериала.
Внимание: заметка содержит спойлеры - но не финальной серии.
Сериал "Игра престолов" стал одним из крупнейших шоу на телевидении за последнее десятилетие. На этой неделе вышла последняя серия, и теперь можно поговорить о том, как в нем были представлены персонажи-женщины.
Как стало ясно из нового исследования, в течение всех восьми сезонов женщины говорят лишь четверть экранного времени.
Речь мужчин составляет около 75% от всех разговоров в сериале, подсчитала исследовательская группа Ceretai.
Доля времени, отведенного разговорам женщин, варьировалась между сезонами, начиная примерно с четверти времени в первом сезоне и слегка повышаясь до трети к предпоследнему, седьмому сезону.
Как оказалось, последний сезон, в котором многие женские персонажи по сюжету были центральными, был одним из худших по количеству их реплик.
Ceretai - это шведский стартап, исследующий разнообразие в популярной культуре. Разработанный им алгоритм научился определять разницу между мужскими и женскими голосами на видео и может посчитать в секундах и процентах продолжительность речи персонажей каждого пола.
Как и большинство автоматических систем, он иногда ошибается. Точность этого алгоритма составляет около 85%, поэтому цифры могут быть немного выше или ниже, тем не менее ясно, что длительность речи мужчин и женщин в сериале далеко не одинаковая.
Анализируя "Игру престолов", в Ceretai хотели показать, что проблема изображения женщин в медиа весьма широка, рассказала Би-би-си соучредитель компании Лиза Хэмберг.
"Мы делаем это не для того, чтобы люди перестали смотреть шоу, а для того, чтобы они осознавали тот факт, что это несправедливое представление о мире", - говорит она.
Исследователи ожидали, что голоса женских персонажей займут около 30% времени. Это средний процент появления женщин на экране согласно исследованию USC Annenberg о неравенстве в 900 популярных фильмах.
Наибольшая доля женской речи в "Игре престолов" обнаружена в пятом эпизоде четвертого сезона - "Имя его".
Сюжетные линии с ведущими женскими персонажами, такими как Серсея Ланнистер и Дейенерис Таргариен, почти уравнивают женскую речь с мужской - она составляет почти половину от общего времени.
Одна из худших в плане равенства - седьмая серия первого сезона "Ты выигрываешь или умрешь", там героини произносят только шестую часть реплик.
Wednesday, May 22, 2019
Thursday, April 25, 2019
श्रीलंका बम धमाके: जब हमलावर और चर्च के पादरी का हुआ आमना-सामना
श्रीलंका में बीते रविवार को हुए बम धमाकों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 359 हो गई है और तकरीबन 500 लोग घायल हैं.
पीड़ित परिवारों ने अपने मृत परिजनों के अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू कर दी हैं.
इस दर्दनाक माहौल में एक चर्च के पादरी फादर स्टेनली ने हमले से पहले कथित हमलावर के साथ हुई अपनी बातचीत को बीबीसी से साझा किया है.
कथित हमलावर से फादर स्टेनली का सामना श्रीलंका के मट्टकालाप्पु इलाके में स्थित सियोन चर्च में हुआ. इस चर्च में हुए हमले में 26 लोगों की मौत हुई जिनमें से ज़्यादातर बच्चे थे.
'मैंने उससे बात की थी'
फादर स्टेनली बताते हैं, "हमारे पेस्टर (पादरी) विदेश में हैं. चूंकि असिस्टेंट पेस्टर भी उपलब्ध नहीं थे. उन्होंने मुझे कई नए लोगों से मिलवाया था. शायद कथित रूप से उस व्यक्ति से भी जिसने इस हमले को अंजाम दिया"
"मैंने उससे बात की थी. मैंने उसे चर्च के अंदर बुलाया. उसने मना कर दिया और कहा कि वह किसी फोन कॉल का इंतज़ार कर रहा है, ऐसे में कॉल आने पर उसे फोन उठाना होगा."
'उसने सर्विस शुरू होने का टाइम पूछा'
फ़ादर स्टेनली कहते हैं, "हमारा ऑफ़िस चर्च के सामने ही है. वह वहीं खड़ा था. उसने मुझसे पूछा कि सर्विस कब शुरू होती है. मैंने उसके सवाल का जवाब दिया और उसे चर्च में दोबारा बुलाया. हम हमेशा सभी का स्वागत करते हैं."
"वह अपने कंधों पर एक बैग टांगे हुए था. आगे की ओर कैमरा बैग जैसी चीज़ थी. मैं उस समय उसके मकसद से परिचित नहीं था. कई बच्चे कह रहे हैं कि ये काम उसी ने किया है."
"एक बार जब सर्विस शुरू हो गई तब मैं अंदर चला गया. इसके दो - तीन मिनट बाद उसने बाहर बम धमाका कर दिया. बम चर्च के अंदर नहीं फटा. कई बच्चे अपनी संडे क्लास के बाद चर्च के बाहर पानी पी रहे थे. वो इसके बाद ही चर्च के अंदर आते हैं. वे बच्चे और कई लोग उस समय चर्च के अंदर घुस रहे थे. उसी समय बम धमाका हो गया."
फादर स्टेनली बताते हैं कि चर्च के बाहर धमाके के बाद हर तरफ़ कोलाहल का माहौल बन गया.
वह कहते हैं, "धमाके के बाद, गाड़ियों और जेनरेटरों में आग लग गई. आग की वजह से हम धमाके में घायल कई लोगों को बचा नहीं सके. हमने बस कुछ बच्चों को धमाके से दूर निकाला."
'फिर एक और धमाका हुआ'
फादर स्टेनली के मुताबिक़, उनके चर्च में पहले धमाके के बाद एक और धमाका हुआ था.
वह कहते हैं, "हमने लोगों को बचाने के लिए पूरी कोशिश की. इसके बाद हमें धमाके की आवाज़ सुनाई दी और सब कुछ आग में बदल गया. हम ये भूलकर इधर-उधर भागने लगे कि कौन ज़िंदा है और कौन मर गया. इस भागदौड़ में मेरी पत्नी और बेटा भी खो गया. इसके बाद मैंने उनकी तलाश शुरू की तो उन्हें एक अस्पताल में पाया. इस हमले में कई बेगुनाह और बच्चों की मौत हुई है. हमें बस इतना पता है."
तथाकथित इस्लामिक स्टेट ने अपने मीडिया पोर्टल 'अमाक़' पर इन हमलों की ज़िम्मेदारी क़बूल की है लेकिन इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती क्यूंकि आम तौर से इस्लामिक स्टेट हमलों के बाद हमलावरों की तस्वीरें प्रकाशित करके हमलों की ज़िम्मेदारी तुरंत क़बूल करता है.
इस बात का कोई सबूत नहीं है कि श्रीलंका के हमलों के तीन दिन बाद किया गया इसका दावा सही है.
श्रीलंका सरकार ने एक स्थानीय जेहादी गुट- नेशनल तौहीद जमात- का नाम लिया है और अधिकारियों ने बम धमाके किसी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की मदद से कराए जाने की बात की है.
अब तक 38 लोग हिरासत में लिए जा चुके हैं. इनमें से 26 लोगों को सीआईडी ने, तीन को आतंकरोधी दस्ते ने और नौ को पुलिस ने गिरफ़्तार किया है.
गिरफ़्तार किए गए लोगों में से सिर्फ़ नौ को अदालत में पेश किया गया है. ये नौ लोग वेल्लमपट्टी की एक ही फ़ैक्ट्री में काम करते हैं.
पीड़ित परिवारों ने अपने मृत परिजनों के अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू कर दी हैं.
इस दर्दनाक माहौल में एक चर्च के पादरी फादर स्टेनली ने हमले से पहले कथित हमलावर के साथ हुई अपनी बातचीत को बीबीसी से साझा किया है.
कथित हमलावर से फादर स्टेनली का सामना श्रीलंका के मट्टकालाप्पु इलाके में स्थित सियोन चर्च में हुआ. इस चर्च में हुए हमले में 26 लोगों की मौत हुई जिनमें से ज़्यादातर बच्चे थे.
'मैंने उससे बात की थी'
फादर स्टेनली बताते हैं, "हमारे पेस्टर (पादरी) विदेश में हैं. चूंकि असिस्टेंट पेस्टर भी उपलब्ध नहीं थे. उन्होंने मुझे कई नए लोगों से मिलवाया था. शायद कथित रूप से उस व्यक्ति से भी जिसने इस हमले को अंजाम दिया"
"मैंने उससे बात की थी. मैंने उसे चर्च के अंदर बुलाया. उसने मना कर दिया और कहा कि वह किसी फोन कॉल का इंतज़ार कर रहा है, ऐसे में कॉल आने पर उसे फोन उठाना होगा."
'उसने सर्विस शुरू होने का टाइम पूछा'
फ़ादर स्टेनली कहते हैं, "हमारा ऑफ़िस चर्च के सामने ही है. वह वहीं खड़ा था. उसने मुझसे पूछा कि सर्विस कब शुरू होती है. मैंने उसके सवाल का जवाब दिया और उसे चर्च में दोबारा बुलाया. हम हमेशा सभी का स्वागत करते हैं."
"वह अपने कंधों पर एक बैग टांगे हुए था. आगे की ओर कैमरा बैग जैसी चीज़ थी. मैं उस समय उसके मकसद से परिचित नहीं था. कई बच्चे कह रहे हैं कि ये काम उसी ने किया है."
"एक बार जब सर्विस शुरू हो गई तब मैं अंदर चला गया. इसके दो - तीन मिनट बाद उसने बाहर बम धमाका कर दिया. बम चर्च के अंदर नहीं फटा. कई बच्चे अपनी संडे क्लास के बाद चर्च के बाहर पानी पी रहे थे. वो इसके बाद ही चर्च के अंदर आते हैं. वे बच्चे और कई लोग उस समय चर्च के अंदर घुस रहे थे. उसी समय बम धमाका हो गया."
फादर स्टेनली बताते हैं कि चर्च के बाहर धमाके के बाद हर तरफ़ कोलाहल का माहौल बन गया.
वह कहते हैं, "धमाके के बाद, गाड़ियों और जेनरेटरों में आग लग गई. आग की वजह से हम धमाके में घायल कई लोगों को बचा नहीं सके. हमने बस कुछ बच्चों को धमाके से दूर निकाला."
'फिर एक और धमाका हुआ'
फादर स्टेनली के मुताबिक़, उनके चर्च में पहले धमाके के बाद एक और धमाका हुआ था.
वह कहते हैं, "हमने लोगों को बचाने के लिए पूरी कोशिश की. इसके बाद हमें धमाके की आवाज़ सुनाई दी और सब कुछ आग में बदल गया. हम ये भूलकर इधर-उधर भागने लगे कि कौन ज़िंदा है और कौन मर गया. इस भागदौड़ में मेरी पत्नी और बेटा भी खो गया. इसके बाद मैंने उनकी तलाश शुरू की तो उन्हें एक अस्पताल में पाया. इस हमले में कई बेगुनाह और बच्चों की मौत हुई है. हमें बस इतना पता है."
तथाकथित इस्लामिक स्टेट ने अपने मीडिया पोर्टल 'अमाक़' पर इन हमलों की ज़िम्मेदारी क़बूल की है लेकिन इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती क्यूंकि आम तौर से इस्लामिक स्टेट हमलों के बाद हमलावरों की तस्वीरें प्रकाशित करके हमलों की ज़िम्मेदारी तुरंत क़बूल करता है.
इस बात का कोई सबूत नहीं है कि श्रीलंका के हमलों के तीन दिन बाद किया गया इसका दावा सही है.
श्रीलंका सरकार ने एक स्थानीय जेहादी गुट- नेशनल तौहीद जमात- का नाम लिया है और अधिकारियों ने बम धमाके किसी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की मदद से कराए जाने की बात की है.
अब तक 38 लोग हिरासत में लिए जा चुके हैं. इनमें से 26 लोगों को सीआईडी ने, तीन को आतंकरोधी दस्ते ने और नौ को पुलिस ने गिरफ़्तार किया है.
गिरफ़्तार किए गए लोगों में से सिर्फ़ नौ को अदालत में पेश किया गया है. ये नौ लोग वेल्लमपट्टी की एक ही फ़ैक्ट्री में काम करते हैं.
Thursday, April 11, 2019
क्यों नहीं मिट सकती चुनावी स्याही?
देश में चुनावी त्यौहार शुरू हो चुका है, कई हिस्सों में मतदाता अपना मत डाल चुके हैं, कई और अभी अपने मत डालेंगे.
वोट करने के दौरान एक सवाल जो अक्सर मतदाता के मन में उठता है वह यह कि आखिर उसका वोट कितना सुरक्षित रहेगा और कोई दूसरा उसके नाम से फ़र्ज़ी वोट तो नहीं डालेगा.
इस शंका की पुष्टि के लिए चुनाव अधिकारी वोटर की उंगली पर वोट देने के साथ ही नीले रंग की स्याही लगा देते हैं. इस नीले रंग की स्याही को भारतीय चुनाव में शामिल करने का श्रेय देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को जाता है.
उंगली पर लगी यह स्याही ही इस बात का प्रतीक होती है कि किसी व्यक्ति ने अपना वोट किया है या नहीं.
लोग स्याही लगी अपनी उंगली की तस्वीर फ़ेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर रहे हैं. इस बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस नीली स्याही को मिटाया जा सकता है.
यह स्याही दक्षिण भारत के में स्थित एक कंपनी में बनाई जाती है. मैसूर पेंट एंड वार्निश लिमिटेड (MVPL) नाम की कंपनी इस स्याही को बनाती है. साल 1937 में इस कंपनी की स्थापना हुई थी. उस समय मैसूर प्रांत के महाराज नलवाडी कृष्णराजा वडयार ने इसकी शुरुआत की थी.
कंपनी इस चुनावी स्याही को थोक में नहीं बेचती है. एमवीपीएल के ज़रिए सरकार या चुनाव से जुड़ी एजेंसियों को ही इस स्याही की सप्लाई की जाती है.
वैसे तो यह कंपनी और भी कई तरह के पेंट बनाती है लेकिन इसकी मुख्य पहचान चुनावी स्याही बनाने के लिए ही है. इसे लोग इलेक्शन इंक या इंडेलिबल इंक के नाम से जानते हैं.
साल 1962 के चुनाव से इस स्याही का इस्तेमाल किया जा रहा है. यह कंपनी भारत के अलावा कई दूसरे देशों में भी चुनावी स्याही की सप्लाई करती है.
चुनावी स्याही को बनाने के लिए सिल्वर नाइट्रेट केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है जिसे कम-से-कम 72 घंटे तक त्वचा से मिटाया नहीं जा सकता.
सिल्वर नाइट्रेट केमिकल को इसलिए इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि यह पानी के संपर्क में आने के बाद काले रंग का हो जाता है और मिटता नहीं है.
जब चुनाव अधिकारी वोटर की उंगली पर स्याही लगाता है तो सिल्वर नाइट्रेट हमारे शरीर में मौजूद नमक के साथ मिलकर सिल्वर क्लोराइड बनाता है.
सिल्वर क्लोराइड पानी घुलता नहीं है और त्वचा से जुड़ा रहता है. इसे साबुन से धोया नहीं जा सकता. यह निशान तभी मिटता है जब धीरे-धीरे त्वचा के सेल पुराने होते जाते हैं और वे उतरने लगते हैं.
एमवीपीएल की वेबसाइट बताती है कि उच्च क्वालिटी की चुनावी स्याही 40 सेकेंड से भी कम समय में सूख जाती है. इसका रिएक्शन इतनी तेजी से होता है कि उंगली पर लगने के एक सेकेंड के भीतर यह अपना निशान छोड़ देता है.
यही वजह है इस स्याही को मिटाया नहीं जा सकता. हालांकि कई लोग यह दावे करते हैं कि कुछ खास केमिकल की मदद से वे इस स्याही को मिटा सकते हैं. लेकिन इसके कोई पुष्ट सबूत नहीं मिलते.
साल 1962 के चुनाव से इस स्याही को इस्तेमाल किया जा रहा है और अभी तक चुनाव आयोग इसके दूसरे विकल्प नहीं तलाश सका.
इससे समझा जा सकता है कि यह अमिट स्याही अपना काम बीते कई दशकों से बेहतर तरीके से कर रही है.
वोट करने के दौरान एक सवाल जो अक्सर मतदाता के मन में उठता है वह यह कि आखिर उसका वोट कितना सुरक्षित रहेगा और कोई दूसरा उसके नाम से फ़र्ज़ी वोट तो नहीं डालेगा.
इस शंका की पुष्टि के लिए चुनाव अधिकारी वोटर की उंगली पर वोट देने के साथ ही नीले रंग की स्याही लगा देते हैं. इस नीले रंग की स्याही को भारतीय चुनाव में शामिल करने का श्रेय देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को जाता है.
उंगली पर लगी यह स्याही ही इस बात का प्रतीक होती है कि किसी व्यक्ति ने अपना वोट किया है या नहीं.
लोग स्याही लगी अपनी उंगली की तस्वीर फ़ेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर रहे हैं. इस बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस नीली स्याही को मिटाया जा सकता है.
यह स्याही दक्षिण भारत के में स्थित एक कंपनी में बनाई जाती है. मैसूर पेंट एंड वार्निश लिमिटेड (MVPL) नाम की कंपनी इस स्याही को बनाती है. साल 1937 में इस कंपनी की स्थापना हुई थी. उस समय मैसूर प्रांत के महाराज नलवाडी कृष्णराजा वडयार ने इसकी शुरुआत की थी.
कंपनी इस चुनावी स्याही को थोक में नहीं बेचती है. एमवीपीएल के ज़रिए सरकार या चुनाव से जुड़ी एजेंसियों को ही इस स्याही की सप्लाई की जाती है.
वैसे तो यह कंपनी और भी कई तरह के पेंट बनाती है लेकिन इसकी मुख्य पहचान चुनावी स्याही बनाने के लिए ही है. इसे लोग इलेक्शन इंक या इंडेलिबल इंक के नाम से जानते हैं.
साल 1962 के चुनाव से इस स्याही का इस्तेमाल किया जा रहा है. यह कंपनी भारत के अलावा कई दूसरे देशों में भी चुनावी स्याही की सप्लाई करती है.
चुनावी स्याही को बनाने के लिए सिल्वर नाइट्रेट केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है जिसे कम-से-कम 72 घंटे तक त्वचा से मिटाया नहीं जा सकता.
सिल्वर नाइट्रेट केमिकल को इसलिए इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि यह पानी के संपर्क में आने के बाद काले रंग का हो जाता है और मिटता नहीं है.
जब चुनाव अधिकारी वोटर की उंगली पर स्याही लगाता है तो सिल्वर नाइट्रेट हमारे शरीर में मौजूद नमक के साथ मिलकर सिल्वर क्लोराइड बनाता है.
सिल्वर क्लोराइड पानी घुलता नहीं है और त्वचा से जुड़ा रहता है. इसे साबुन से धोया नहीं जा सकता. यह निशान तभी मिटता है जब धीरे-धीरे त्वचा के सेल पुराने होते जाते हैं और वे उतरने लगते हैं.
एमवीपीएल की वेबसाइट बताती है कि उच्च क्वालिटी की चुनावी स्याही 40 सेकेंड से भी कम समय में सूख जाती है. इसका रिएक्शन इतनी तेजी से होता है कि उंगली पर लगने के एक सेकेंड के भीतर यह अपना निशान छोड़ देता है.
यही वजह है इस स्याही को मिटाया नहीं जा सकता. हालांकि कई लोग यह दावे करते हैं कि कुछ खास केमिकल की मदद से वे इस स्याही को मिटा सकते हैं. लेकिन इसके कोई पुष्ट सबूत नहीं मिलते.
साल 1962 के चुनाव से इस स्याही को इस्तेमाल किया जा रहा है और अभी तक चुनाव आयोग इसके दूसरे विकल्प नहीं तलाश सका.
इससे समझा जा सकता है कि यह अमिट स्याही अपना काम बीते कई दशकों से बेहतर तरीके से कर रही है.
Wednesday, April 3, 2019
चुनाव से पहले WhatsApp की सख्ती, बिना सहमति ग्रुप में एंट्री नहीं, फैक्ट चेक के लिए नंबर जारी
WhatsApp ने भारत में फैक्ट चेकिंग सर्विस लॉन्च की है. आम चुनाव जल्द होने वाले हैं और इससे पहले कंपनी ने ये कदम उठाया है. अगर आपको ऐसा लगता है कि WhatsApp पर फेक मैसेज आया है तो आप इसे ne पर भेज सकते हैं जो फेक मैसेज को वेरिफाई करेगी.
Checkpoint Tipline फैक्ट चेक करने वाली एक लोकल स्टार्टअप है जहां फर्जी खबरों का फैक्ट चेक किया जाएगा. जो फर्जी खबर होगी वहां False, Misleading या Disputed का लेबल दिया जाएगा. जबकि सही खबर पर True का लेबल मिलेगा.
वॉट्सऐप ने ग्रुप इन्विटेशन सिस्टम भी शुरुआत किया है जिसके बारे में हमने पहले भी बताया है. इसके तहत बिना किसी के सहमती के किसी को आप ग्रुप में नहीं ऐड कर पाएंगे.
WhatsApp के इस नए फीचर के तहत आप 9643000888 नंबर पर कोई ऐसे मैसेज फॉरवर्ड कर सकते हैं जिस पर आपको शक है. टीम खबरों को वेरिफाई करेगी और सच या झूठ है ये बताएगी.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक वॉट्सऐप ने जो ये फैक्ट चेकिंग सर्विस लॉन्च की है इसे शुरुआती प्रॉब्लम आ सकती है. हमने भी फैक्ट चेक पर एक लिंक भेजा जिसके जवाब में कहा गया, ‘जुड़ने के लिए धन्यवाद लेकिन हम इसे आगे नहीं बढ़ा सकते हैं. रॉयटर्स के मुताबिक एक मैसेज के रिपोर्ट में दो घंटे तक कोई रेस्पॉन्स नहीं मिला है.
फैक्ट चेक पांच लैंग्वेज को सपोर्ट करता है – इंग्लिश, हिंदी, तेलुगू, बंगाली और मलयालम. टेक्स्ट, वीडिय और इमेज का वेरिफिकेशन किया जा सकता है.
गौरतलब है कि वॉट्सऐप फर्जी फोटो को चेक करने के लिए रिवर्स इमेज सर्च का भी फीचर देने की तैयारी कर रही है. हालांकि ये फीचर अभी टेस्टिंग के फेस में है और जल्द ही यूजर्स को दिया जा सकता है.
फेक न्यूज से बचने के लिए वॉट्सऐप ने बल्क मैसेज फॉरवर्ड पर भी लगाम लगाया है. अब एक साथ पांच लोगों को मैसेज फॉरवर्ड करने की लिमिट सेट कर दी गई है, ताकि फर्जी खबरों को फैलाया न जा सके.
अल्जीरिया की सरकारी मीडिया के मुताबिक़ राष्ट्रपति अब्दुलअज़ीज़ बूतेफ़्लीका ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. उनके ख़िलाफ़ कई सप्ताह से देश भर में व्यापक प्रदर्शन हो रहे थे.
बीस सालों से सत्ता पर क़ाबिज़ बूतेफ़्लीका पहले ही कह चुके थे कि वो इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगे और 28 अप्रैल को अपना कार्यकाल समाप्त होने पर पद छोड़ देंगे.
हालांकि प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे लोगों ने कहा था कि पद छोड़ने का वादा काफ़ी नहीं है और वो तुरंत पद छोड़ें.
अल्जीरिया की शक्तिशाली सेना ने 82 वर्षीय बूतेफ़्लीका को देश की सत्ता संभालने के अयोग्य घोषित करते हुए उनसे इस्तीफ़ा देने के लिए कह दिया था.
Checkpoint Tipline फैक्ट चेक करने वाली एक लोकल स्टार्टअप है जहां फर्जी खबरों का फैक्ट चेक किया जाएगा. जो फर्जी खबर होगी वहां False, Misleading या Disputed का लेबल दिया जाएगा. जबकि सही खबर पर True का लेबल मिलेगा.
वॉट्सऐप ने ग्रुप इन्विटेशन सिस्टम भी शुरुआत किया है जिसके बारे में हमने पहले भी बताया है. इसके तहत बिना किसी के सहमती के किसी को आप ग्रुप में नहीं ऐड कर पाएंगे.
WhatsApp के इस नए फीचर के तहत आप 9643000888 नंबर पर कोई ऐसे मैसेज फॉरवर्ड कर सकते हैं जिस पर आपको शक है. टीम खबरों को वेरिफाई करेगी और सच या झूठ है ये बताएगी.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक वॉट्सऐप ने जो ये फैक्ट चेकिंग सर्विस लॉन्च की है इसे शुरुआती प्रॉब्लम आ सकती है. हमने भी फैक्ट चेक पर एक लिंक भेजा जिसके जवाब में कहा गया, ‘जुड़ने के लिए धन्यवाद लेकिन हम इसे आगे नहीं बढ़ा सकते हैं. रॉयटर्स के मुताबिक एक मैसेज के रिपोर्ट में दो घंटे तक कोई रेस्पॉन्स नहीं मिला है.
फैक्ट चेक पांच लैंग्वेज को सपोर्ट करता है – इंग्लिश, हिंदी, तेलुगू, बंगाली और मलयालम. टेक्स्ट, वीडिय और इमेज का वेरिफिकेशन किया जा सकता है.
गौरतलब है कि वॉट्सऐप फर्जी फोटो को चेक करने के लिए रिवर्स इमेज सर्च का भी फीचर देने की तैयारी कर रही है. हालांकि ये फीचर अभी टेस्टिंग के फेस में है और जल्द ही यूजर्स को दिया जा सकता है.
फेक न्यूज से बचने के लिए वॉट्सऐप ने बल्क मैसेज फॉरवर्ड पर भी लगाम लगाया है. अब एक साथ पांच लोगों को मैसेज फॉरवर्ड करने की लिमिट सेट कर दी गई है, ताकि फर्जी खबरों को फैलाया न जा सके.
अल्जीरिया की सरकारी मीडिया के मुताबिक़ राष्ट्रपति अब्दुलअज़ीज़ बूतेफ़्लीका ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. उनके ख़िलाफ़ कई सप्ताह से देश भर में व्यापक प्रदर्शन हो रहे थे.
बीस सालों से सत्ता पर क़ाबिज़ बूतेफ़्लीका पहले ही कह चुके थे कि वो इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगे और 28 अप्रैल को अपना कार्यकाल समाप्त होने पर पद छोड़ देंगे.
हालांकि प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे लोगों ने कहा था कि पद छोड़ने का वादा काफ़ी नहीं है और वो तुरंत पद छोड़ें.
अल्जीरिया की शक्तिशाली सेना ने 82 वर्षीय बूतेफ़्लीका को देश की सत्ता संभालने के अयोग्य घोषित करते हुए उनसे इस्तीफ़ा देने के लिए कह दिया था.
Thursday, March 21, 2019
पाकिस्तान को अमेरिका की चेतावनी- अब भारत पर हमला हुआ तो 'बहुत मुश्किल' हो जाएगी
आतंकवाद के मसले पर अमेरिका ने पाकिस्तान को सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर भारत पर आगे कोई आतंकी हमला होता है तो यह उसके लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है. पाकिस्तान को आगाह करते हुए अमेरिका ने साफ कर दिया है कि उसे आतंकी संगठनों पर ठोस कार्रवाई करनी होगी. अमेरिका ने पाकिस्तान को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि खास-तौर पर जैश-ए मोहम्मद और लश्कर-ए तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ पाकिस्तान को पुख्ता एक्शन लेना होगा.
वाशिंगटन में व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बुधवार को बताया कि पाकिस्तान को आतंकी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की जरूरत है. भारत-पाकिस्तान क्षेत्र में किसी प्रकार का तनाव पैदा न हो, इसके लिए जरूरी है कि पाकिस्तान खासकर जैश-ए मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के खिलाफ सख्त कदम उठाए. अमेरिका ने कहा है कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो दोनों देशों के लिए खतरनाक होंगे. बता दें कि जैश-ए मोहम्मद वो आतंकी संगठन है, जिसने पुलवामा में 14 फरवरी को सीआरपीएफ जवानों के काफिले को निशाना बनाया था और उसमें 40 जवानों की शहादत हुई थी. इस हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान पर एयरस्ट्राइक कर वहां मौजूद आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया था. पुलवामा के दोषियों पर कार्रवाई के लिए भारत पाकिस्तान को सबूत भी सौंप चुका है.
अमेरिकी अधिकारी ने ये भी कहा कि पिछले कुछ दिनों में पाकिस्तान ने शुरुआती एक्शन लिए हैं, जिसमें आतंकी संगठनों की संपत्तियां जब्त की गई हैं और उनकी गिरफ्तारियां भी हुई हैं. पाकिस्तान ने जैश के कुछ प्रमुख ठिकानों को भी अपने कब्जे में लिया है. लेकिन हम इससे काफी ज्यादा एक्शन देखना चाहते हैं. अमेरिका ने पाकिस्तान से स्पष्ट कहा है कि पहले भी पाकिस्तान की तरफ से गिरफ्तारी जैसे कदम उठाए गए हैं, लेकिन बाद में इन आतंकियों को छोड़ दिया जाता है. यहां तक कि आतंक के आकाओं को पूरे देश में घूमने की भी इजाजत मिल जाती है. ऐसे में पाकिस्तान को अब एकदम ठोस कार्रवाई करनी होगी.
बालाकोट में भारतीय वायुसेना की कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की ओर से उठाए गए कदमों के बारे में पूछे जाने पर व्हाइट हाउस के अधिकार ने कहा कि अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय देखना चाहता है कि आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस और निर्णायक कार्रवाई हो. अधिकारी ने कहा, 'अभी पाकिस्तान की ओर से उठाए गए कदमों को लेकर पूर्ण आकलन करना जल्दबाजी होगी. हाल के दिनों में पाकिस्तान ने कुछ शुरुआती कदम उठाए हैं. मसलन, कुछ आतंकी संगठनों की संपत्तियां जब्त की गई हैं और कुछ की गिरफ्तारी भी हुई हैं और जैश के कुछ ठिकानों को प्रशासन ने अपने कब्जे में लिया है. लेकिन इन कदमों के अलावा अभी पाकिस्तान की ओर से बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है.
बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान ने चुनाव लड़ने की खबरों पर विराम लगा दिया है. अभिनेता सलमान खान ने गुरुवार को ट्वीट कर कहा, ना चुनाव लड़ूंगा और ना किसी पार्टी का प्रचार करूंगा. सलमान खान ने एक तरह से सियासत से तौबा करते हुए कहा कि चुनाव लड़ने की अटकलों में कोई दम नहीं है.
वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वोटरों को प्रेरित करने के लिए हाल ही में सलमान खान और आमिर खान को टैग करते हुए ट्वीट किया था, जिसमें लिखा था कि वोटिंग सिर्फ अधिकार नहीं है बल्कि कर्तव्य भी है. ये वक्त देश के युवाओं को अपने अंदाज में वोट करने के लिए प्रेरित करने का है, जिससे हम अपने लोकतंत्र और देश को मजबूत कर सकें. सलमान खान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस ट्वीट का होली के दिन जवाब देते हुए लिखा कि 'हम लोकतंत्र में रहते हैं, वोट डालना हर भारतीय का कर्तव्य है. मैं हर वोटर से कहूंगा कि अपने अधिकार का इस्तेमाल करें.
बता दें कि मध्य प्रदेश कांग्रेस बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान को प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर में अपने प्रत्याशी के लिए लोकसभा चुनाव प्रचार में उतारने की कोशिश में था. जिससे बीजेपी का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर 30 साल बाद जीत दर्ज की जा सके.
सलमान का जन्म इंदौर के पलासिया इलाके में हुआ था और मुंबई में शिफ्ट होने से पहले उन्होंने इंदौर शहर में अपने बचपन का काफी समय गुजारा है. मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी ने कहा था कि हमारे नेता सलमान खान से इंदौर में पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करने की पहले ही बातचीत कर चुके हैं. हालांकि सलमान खान ने अब राजनीति में उतरने की खबरों और कयासों का खंडन कर दिया है.
वाशिंगटन में व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बुधवार को बताया कि पाकिस्तान को आतंकी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की जरूरत है. भारत-पाकिस्तान क्षेत्र में किसी प्रकार का तनाव पैदा न हो, इसके लिए जरूरी है कि पाकिस्तान खासकर जैश-ए मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के खिलाफ सख्त कदम उठाए. अमेरिका ने कहा है कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो दोनों देशों के लिए खतरनाक होंगे. बता दें कि जैश-ए मोहम्मद वो आतंकी संगठन है, जिसने पुलवामा में 14 फरवरी को सीआरपीएफ जवानों के काफिले को निशाना बनाया था और उसमें 40 जवानों की शहादत हुई थी. इस हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान पर एयरस्ट्राइक कर वहां मौजूद आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया था. पुलवामा के दोषियों पर कार्रवाई के लिए भारत पाकिस्तान को सबूत भी सौंप चुका है.
अमेरिकी अधिकारी ने ये भी कहा कि पिछले कुछ दिनों में पाकिस्तान ने शुरुआती एक्शन लिए हैं, जिसमें आतंकी संगठनों की संपत्तियां जब्त की गई हैं और उनकी गिरफ्तारियां भी हुई हैं. पाकिस्तान ने जैश के कुछ प्रमुख ठिकानों को भी अपने कब्जे में लिया है. लेकिन हम इससे काफी ज्यादा एक्शन देखना चाहते हैं. अमेरिका ने पाकिस्तान से स्पष्ट कहा है कि पहले भी पाकिस्तान की तरफ से गिरफ्तारी जैसे कदम उठाए गए हैं, लेकिन बाद में इन आतंकियों को छोड़ दिया जाता है. यहां तक कि आतंक के आकाओं को पूरे देश में घूमने की भी इजाजत मिल जाती है. ऐसे में पाकिस्तान को अब एकदम ठोस कार्रवाई करनी होगी.
बालाकोट में भारतीय वायुसेना की कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की ओर से उठाए गए कदमों के बारे में पूछे जाने पर व्हाइट हाउस के अधिकार ने कहा कि अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय देखना चाहता है कि आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस और निर्णायक कार्रवाई हो. अधिकारी ने कहा, 'अभी पाकिस्तान की ओर से उठाए गए कदमों को लेकर पूर्ण आकलन करना जल्दबाजी होगी. हाल के दिनों में पाकिस्तान ने कुछ शुरुआती कदम उठाए हैं. मसलन, कुछ आतंकी संगठनों की संपत्तियां जब्त की गई हैं और कुछ की गिरफ्तारी भी हुई हैं और जैश के कुछ ठिकानों को प्रशासन ने अपने कब्जे में लिया है. लेकिन इन कदमों के अलावा अभी पाकिस्तान की ओर से बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है.
बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान ने चुनाव लड़ने की खबरों पर विराम लगा दिया है. अभिनेता सलमान खान ने गुरुवार को ट्वीट कर कहा, ना चुनाव लड़ूंगा और ना किसी पार्टी का प्रचार करूंगा. सलमान खान ने एक तरह से सियासत से तौबा करते हुए कहा कि चुनाव लड़ने की अटकलों में कोई दम नहीं है.
वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वोटरों को प्रेरित करने के लिए हाल ही में सलमान खान और आमिर खान को टैग करते हुए ट्वीट किया था, जिसमें लिखा था कि वोटिंग सिर्फ अधिकार नहीं है बल्कि कर्तव्य भी है. ये वक्त देश के युवाओं को अपने अंदाज में वोट करने के लिए प्रेरित करने का है, जिससे हम अपने लोकतंत्र और देश को मजबूत कर सकें. सलमान खान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस ट्वीट का होली के दिन जवाब देते हुए लिखा कि 'हम लोकतंत्र में रहते हैं, वोट डालना हर भारतीय का कर्तव्य है. मैं हर वोटर से कहूंगा कि अपने अधिकार का इस्तेमाल करें.
बता दें कि मध्य प्रदेश कांग्रेस बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान को प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर में अपने प्रत्याशी के लिए लोकसभा चुनाव प्रचार में उतारने की कोशिश में था. जिससे बीजेपी का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर 30 साल बाद जीत दर्ज की जा सके.
सलमान का जन्म इंदौर के पलासिया इलाके में हुआ था और मुंबई में शिफ्ट होने से पहले उन्होंने इंदौर शहर में अपने बचपन का काफी समय गुजारा है. मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी ने कहा था कि हमारे नेता सलमान खान से इंदौर में पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करने की पहले ही बातचीत कर चुके हैं. हालांकि सलमान खान ने अब राजनीति में उतरने की खबरों और कयासों का खंडन कर दिया है.
Thursday, March 7, 2019
मोदी सरकार के स्वच्छ भारत मिशन में कितना साफ़ हुआ देश?
दावा- स्वच्छ भारत मिशन के तहत केन्द्र सरकार ने एक करोड़ शौचालय बनाने की घोषणा की थी. प्रधानमंत्री मोदी का दावा है कि अब भारत के 90 फ़ीसदी घरों में शौचालय है, जिनमें से तक़रीबन 40 फ़ीसदी 2014 में नई सरकार के आने के बाद बने हैं.
सच्चाई - ये बात सही है कि मोदी सरकार के समय घरों में शौचालय बनाने के काम ने रफ़्तार पकड़ी है, लेकिन ये बात भी सही है कि अलग-अलग कारणों से नए बने शौचालयों का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.
"आज, 90 फ़ीसदी से ज़्यादा घरों में टॉयलेट की सुविधा मौजूद है, जो 2014 के पहले केवल 40 फ़ीसदी घरों में थी" सितंबर 2018 में नरेन्द्र मोदी ने ऐसा कहा था.
लेकिन विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इस परियोजना की आलोचना की थी.
कांग्रेस सरकार में पेयजल और स्वच्छता मंत्री रहे जयराम रमेश ने पिछले साल अक्टूबर में कहा था, "हवाई दावों को सच साबित करने के लिए बड़े पैमाने पर शौचालयों के निर्माण के लक्ष्य को पूरी तरह से भटका दिया."
स्वच्छ भारत ग्रमीण - इसके तहत गांवों में हर घर में शौचालय बनाने और खुले में शौच मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है.
स्वच्छ भारत शहरी - घरों के अलावा सार्वजनिक स्थानों पर भी शौचालय हो, ये सुनिश्चित करना इस मिशन का मक़सद है. साथ ही कूड़ा-कचरा प्रबंधन पर भी मिशन में ज़्यादा फ़ोकस है.
भारत में खुले में शौच सालों से चली आ रही समस्या है, जिसकी वजह से कई बीमारियां भी फैलती हैं.
महिलाओं के लिए ये सुरक्षा से जुड़ा मामला भी है, क्योंकि घर में शौचालय नहीं होने की सूरत में महिलाओं को अंधेरे में शौच के लिए बाहर जाना पड़ता है.
भारत सरकार स्वच्छ भारत मिशन को सफल बताते हुए दावा कर रही है कि लक्ष्य का 96.25 फ़ीसदी काम पूरा हो चुका है.
जबकि अक्टूबर 2014 के पहले केवल 38.7 फ़ीसदी घरों में ही शौचालय थे.
इन आंकड़ों से साफ़ है कि भाजपा के शासन में कांग्रेस के शासनकाल से मुक़ाबले दोगुनी तेजी से शौचालय बने हैं.
स्वच्छ भारत मिशन: कितनी सफ़ाई.. कितनी गंदगी..
‘खुले में शौच मुक्त’ घोषित होने के लिए बिहार कितना तैयार?
भारत के ग्रामीण इलाक़े, कितने खुले में शौच मुक्त हो पाए हैं, उस पर NARSS नाम की एक स्वतंत्र एजेंसी ने सर्वे किया है. नवंबर 2017 और मार्च 2018 के बीच किए गए इस सर्वे में 77 फीसदी ग्रामीण घरों में शौचालय पाए गए और ये भी बताया गया कि भारत में 93.4 फ़ीसदी लोग शौचालय का इस्तेमाल करते हैं.
इस सर्वे में 6,136 गांवों के 92,000 घरों को शामिल किया गया.
स्वच्छ भारत मिशन की वेबसाइट पर दावा किया गया है कि देश भर के 36 में से 27 राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश खुले में शौच मुक्त हो गए हैं, जबकि 2015-16 में केवल सिक्किम ही एकमात्र ऐसा राज्य था, जो खुले में शौच मुक्त था.
टॉयलेट का इस्तेमाल
केन्द्र में मोदी सरकार के कार्यकाल में देश भर में कितने शौचालय बने इसके कई आंकड़े हैं, लेकिन इसका कोई आंकड़ा नहीं कि बनाए गए शौचालयों का कितने लोग इस्तेमाल करते हैं.
साफ़ है कि शौचालय बनाने का ये मतलब कतई नहीं माना जाए कि उन शौचालयों का इस्तेमाल हो भी रहा है.
नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफ़िस के 2016 के आंकड़े के मुताबिक़ दो साल पहले जिन 45 फ़ीसदी घरों में शौचालय थे उनमें से पांच फ़ीसदी घरों में शौचालय का इस्तेमाल नहीं होता था और तीन फ़ीसदी घरों में शौचालयों में पानी का कनेक्शन नहीं था.
स्वच्छ भारत ग्रामीण मिशन में सचिव परमेश्वरन अय्यर ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि स्वच्छ भारत मिशन के सफर में तब से अब तक कई बदलाव हुए हैं.
लेकिन कई एनजीओ ने इस मिशन पर काफी पड़ताल की है और उनकी पड़ताल में इस मिशन की कई ख़ामियां सामने आई हैं-
• कई शौचालय सिंगल पिट बन कर तैयार हुए हैं, जो हर पांच से सात साल में भर जाते हैं.
• कई जगहों पर शौचालयों के रख-रखाव की समस्या है.
• कई शहरों और गांवों में टारगेट ही गलत सेट किए गए हैं.
2015 में मोदी सरकार ने दावा किया था कि हर सरकारी स्कूल में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय बनाए गए हैं.
लेकिन 2016 की ASER रिपोर्ट के मुताबिक़ 23 फीसदी सरकारी स्कूल में शौचालय की सुविधा है ही नहीं.
स्वच्छ भारत मिशन के कई रिपोर्ट से ये भी पता चला है कि शौचालय बनाने के टारगेट कई साल पुराने है और तब से अब तक काफी पानी बह चुका है.
2018 में गुजरात के स्वच्छ भारत मिशन पर जारी की गई CAG रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात में शौचालय बनाने के टारगेट 2012 के हैं. लेकिन तब से अब तक वहां जनसंख्या भी बढ़ गई है और परिवार की संख्या भी.
खुले में शौच मुक्त का सच
बीबीसी की मराठी सेवा ने 2018 में महाराष्ट्र सरकार के दावों का सच जानने के लिए ख़ुद ही कुछ इलाक़ों का सर्वेक्षण किया था. उन्होंने पाया कि एक गांव में 25 फ़ीसदी घरों में शौचालय की सुविधा नहीं थी और वो खुले में शौच के लिए जाने के लिए मजबूर थे.
जैसे ही बीबीसी मराठी सेवा की कहानी स्थानीय प्रशासन के कानों तक पहुंची, प्रशासन तुरंत हरकत में आया जिसके बाद वहां और शौचालय बनाए गए.
सच्चाई - ये बात सही है कि मोदी सरकार के समय घरों में शौचालय बनाने के काम ने रफ़्तार पकड़ी है, लेकिन ये बात भी सही है कि अलग-अलग कारणों से नए बने शौचालयों का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.
"आज, 90 फ़ीसदी से ज़्यादा घरों में टॉयलेट की सुविधा मौजूद है, जो 2014 के पहले केवल 40 फ़ीसदी घरों में थी" सितंबर 2018 में नरेन्द्र मोदी ने ऐसा कहा था.
लेकिन विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इस परियोजना की आलोचना की थी.
कांग्रेस सरकार में पेयजल और स्वच्छता मंत्री रहे जयराम रमेश ने पिछले साल अक्टूबर में कहा था, "हवाई दावों को सच साबित करने के लिए बड़े पैमाने पर शौचालयों के निर्माण के लक्ष्य को पूरी तरह से भटका दिया."
स्वच्छ भारत ग्रमीण - इसके तहत गांवों में हर घर में शौचालय बनाने और खुले में शौच मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है.
स्वच्छ भारत शहरी - घरों के अलावा सार्वजनिक स्थानों पर भी शौचालय हो, ये सुनिश्चित करना इस मिशन का मक़सद है. साथ ही कूड़ा-कचरा प्रबंधन पर भी मिशन में ज़्यादा फ़ोकस है.
भारत में खुले में शौच सालों से चली आ रही समस्या है, जिसकी वजह से कई बीमारियां भी फैलती हैं.
महिलाओं के लिए ये सुरक्षा से जुड़ा मामला भी है, क्योंकि घर में शौचालय नहीं होने की सूरत में महिलाओं को अंधेरे में शौच के लिए बाहर जाना पड़ता है.
भारत सरकार स्वच्छ भारत मिशन को सफल बताते हुए दावा कर रही है कि लक्ष्य का 96.25 फ़ीसदी काम पूरा हो चुका है.
जबकि अक्टूबर 2014 के पहले केवल 38.7 फ़ीसदी घरों में ही शौचालय थे.
इन आंकड़ों से साफ़ है कि भाजपा के शासन में कांग्रेस के शासनकाल से मुक़ाबले दोगुनी तेजी से शौचालय बने हैं.
स्वच्छ भारत मिशन: कितनी सफ़ाई.. कितनी गंदगी..
‘खुले में शौच मुक्त’ घोषित होने के लिए बिहार कितना तैयार?
भारत के ग्रामीण इलाक़े, कितने खुले में शौच मुक्त हो पाए हैं, उस पर NARSS नाम की एक स्वतंत्र एजेंसी ने सर्वे किया है. नवंबर 2017 और मार्च 2018 के बीच किए गए इस सर्वे में 77 फीसदी ग्रामीण घरों में शौचालय पाए गए और ये भी बताया गया कि भारत में 93.4 फ़ीसदी लोग शौचालय का इस्तेमाल करते हैं.
इस सर्वे में 6,136 गांवों के 92,000 घरों को शामिल किया गया.
स्वच्छ भारत मिशन की वेबसाइट पर दावा किया गया है कि देश भर के 36 में से 27 राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश खुले में शौच मुक्त हो गए हैं, जबकि 2015-16 में केवल सिक्किम ही एकमात्र ऐसा राज्य था, जो खुले में शौच मुक्त था.
टॉयलेट का इस्तेमाल
केन्द्र में मोदी सरकार के कार्यकाल में देश भर में कितने शौचालय बने इसके कई आंकड़े हैं, लेकिन इसका कोई आंकड़ा नहीं कि बनाए गए शौचालयों का कितने लोग इस्तेमाल करते हैं.
साफ़ है कि शौचालय बनाने का ये मतलब कतई नहीं माना जाए कि उन शौचालयों का इस्तेमाल हो भी रहा है.
नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफ़िस के 2016 के आंकड़े के मुताबिक़ दो साल पहले जिन 45 फ़ीसदी घरों में शौचालय थे उनमें से पांच फ़ीसदी घरों में शौचालय का इस्तेमाल नहीं होता था और तीन फ़ीसदी घरों में शौचालयों में पानी का कनेक्शन नहीं था.
स्वच्छ भारत ग्रामीण मिशन में सचिव परमेश्वरन अय्यर ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि स्वच्छ भारत मिशन के सफर में तब से अब तक कई बदलाव हुए हैं.
लेकिन कई एनजीओ ने इस मिशन पर काफी पड़ताल की है और उनकी पड़ताल में इस मिशन की कई ख़ामियां सामने आई हैं-
• कई शौचालय सिंगल पिट बन कर तैयार हुए हैं, जो हर पांच से सात साल में भर जाते हैं.
• कई जगहों पर शौचालयों के रख-रखाव की समस्या है.
• कई शहरों और गांवों में टारगेट ही गलत सेट किए गए हैं.
2015 में मोदी सरकार ने दावा किया था कि हर सरकारी स्कूल में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय बनाए गए हैं.
लेकिन 2016 की ASER रिपोर्ट के मुताबिक़ 23 फीसदी सरकारी स्कूल में शौचालय की सुविधा है ही नहीं.
स्वच्छ भारत मिशन के कई रिपोर्ट से ये भी पता चला है कि शौचालय बनाने के टारगेट कई साल पुराने है और तब से अब तक काफी पानी बह चुका है.
2018 में गुजरात के स्वच्छ भारत मिशन पर जारी की गई CAG रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात में शौचालय बनाने के टारगेट 2012 के हैं. लेकिन तब से अब तक वहां जनसंख्या भी बढ़ गई है और परिवार की संख्या भी.
खुले में शौच मुक्त का सच
बीबीसी की मराठी सेवा ने 2018 में महाराष्ट्र सरकार के दावों का सच जानने के लिए ख़ुद ही कुछ इलाक़ों का सर्वेक्षण किया था. उन्होंने पाया कि एक गांव में 25 फ़ीसदी घरों में शौचालय की सुविधा नहीं थी और वो खुले में शौच के लिए जाने के लिए मजबूर थे.
जैसे ही बीबीसी मराठी सेवा की कहानी स्थानीय प्रशासन के कानों तक पहुंची, प्रशासन तुरंत हरकत में आया जिसके बाद वहां और शौचालय बनाए गए.
Thursday, February 28, 2019
अमरीकी विमानों के दम पर टिकी है पाकिस्तानी वायु सेना
13 अप्रैल, 1948 को पाकिस्तान के रिसालपुर में पहली बार मोहम्मद अली जिन्ना ने तत्कालीन रॉयल पाकिस्तान वायु सेना के सदस्यों से कहा था कि "पाकिस्तान को अपनी वायु सेना जल्द तैयार कर लेनी चाहिए."
इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा था कि "यह एक कुशल वायु सेना होनी चाहिए, जो किसी से भी पीछे नहीं हो और पाकिस्तान की रक्षा के लिए सेना और नौसेना के साथ खड़ा हो सके."
71 साल बाद आज पाकिस्तानी वायु सेना सुर्ख़ियों में है और स्थितियां सामान्य नहीं हैं.
बालाकोट के बाद भारत और पाकिस्तान की वायु सेना सक्रिय हैं और दोनों देशों ने एक-दूसरे के विमानों को मार गिराने का दावा किया है.
भारतीय वायु सेना दुनिया की चौथी बड़ी सेना है. उसके पास 31 लड़ाकू दस्ता है. एक लड़ाकू दस्ते में 17 से 18 जेट होते हैं.
वहीं पाकिस्तान अपने पास 20 लड़ाकू दस्ता होने का दावा करता है और इस तरह भारतीय वायु सेना पाकिस्तानी वायु सेना से कहीं आगे है.
लेकिन इस तरह की तुलना एक-दूसरे के शक्तिशाली होने की पूरी कहानी नहीं बताता है.
रॉयल पाकिस्तान वायु सेना के शुरुआती दिन बहुत अच्छे नहीं थे. इस बात का ज़िक्र पाकिस्तान के आधिकारिक इतिहास में किया गया है.
लिखा गया है, "बंटवारे के निर्णय के बाद आधिकारिक समझौते के तहत पाकिस्तान को हथियारों, उपकरणों और विमानों का वैध हिस्सा देने के बाद भी भारत ने तत्कालीन रॉयल पाकिस्तान वायु सेना को मानने से इंकार कर दिया था."
"भारत से जो भी मिला था उसमें से अधिकांश सही नहीं थे. उपकरणों के बक्से में रद्दी माल और बेकार चीज़ें थीं और कुछ नहीं था."
कश्मीर को लेकर 1947-48 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष के बाद पाकिस्तान वायु सेना की यात्रा की शुरुआत हुई.
1965 और 1971 में लड़े गए युद्धों के दौरान भारत और पाकिस्तान की वायुसेना ने सक्रिय भूमिका निभाई थी. यही कारण है कि दोनों देश की सेना इनके पराक्रमों को मान्यता देती है.
आज पाकिस्तान के एफ़-16 और जेएफ़-17 थंडर विमानों की बात हो रही है. एफ़-16 का निर्माण अमरीका करता है, वहीं जेएफ़-17 थंडर चीन की मदद से पाकिस्तान ने बनाया है.
एफ़-16 सिंगल इंजन लड़ाकू विमान है, जिसे पाकिस्तान ने पहली बार 1982 में अपनाया था. अभी पाकिस्तान के पास इसका चौथा जेनरेशन मॉडल है.
इसके मुक़ाबले जेफ़-17 कहीं हल्का और सभी तरह के मौसम में इस्तेमाल किया जाने वाला लड़ाकू विमान है. इसे दिन और रात कभी भी इस्तेमाल किया जा सकता है. यह 'मल्टी-रोल' लड़ाकू विमान है.
आने वाले सालों में यह पाकिस्तान वायु सेना का सबसे शक्तिशाली विमान होगा, जो फ्रांस के मिराज जैसे पुराने विमानों की जगह ले लेगा.
पाकिस्तान वायु सेना जेएफ़-17 की पांचवी पीढ़ी को विकसित कर रहा है जो और भी उन्नत संस्करण होगा. हालांकि इस बारे में बहुत कम सुना और देखा गया है.
पाकिस्तान वायु सेना तीन जगहों से अपना नियंत्रण क़ायम करता है- पेशावर, लाहौर और कराची. इसके अलावा इसका एयर डिफेंस कमांड रावलपिंडी में है और स्ट्रैटेजिक कमांड इस्लामाबाद में है.
पाकिस्तान दावा करता है कि उसके पास एयर रडार, जटिल रख रखाव की सुविधाएं और उसे लॉन्च करने का बेहतर सेटअप नेटवर्क है.
हालांकि ये दावे मई 2011 में धरे रह गए थे, जब अमरीकी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान से पाकिस्तान में घुस कर ओसामा बिन लादेन को मारा था.
पाकिस्तान वायु सेना उस समय अमरीकी घुसपैठ का पता नहीं लगा सकी थी, जिसने सभी को चौंका दिया था.
पिछले साल कैलिफोर्निया के थिंकटैंक रंद कोऑर्पोरेशन ने कहा था, "पाकिस्तान वायु सेना के नीतिगत निर्णय थल सेना लेती है. ये निर्णय वायु सेनाध्यक्ष की सलाह पर लिए जाते हैं. इसलिए वायु सेना के असल निति निर्धारक वायु सेना अध्यक्ष नहीं, थल सेना अध्यक्ष होते हैं."
इसका वायु सेना पर क्या असर होता है?
पाकिस्तान वायु सेना के पूर्व एयर ऑपरेशन डायरेक्टर और लेखक क़ैसर तुफ़ैल कहते हैं, "दुनिया में कोई भी वायु सेना ऐसी नहीं है, जिसके पास वो सबकुछ है जो वह चाहता है. कुछ मायनों में आर्थिक ज़रूरत कभी पूरी नहीं होती, क्या ऐसा नहीं है? लेकिन मैं उन सभी से असहमत हूं जो यह कहता है कि पाकिस्तान वायु सेना को उसका हक़ नहीं मिलता है."
पाकिस्तान वायु सेना के विकास के बारे में वो बताते हैं, "मेरे हिसाब से पाकिस्तान वायु सेना का विकास तीन चरणों से गुज़रा है. पहला, पाकिस्तान के गणतंत्र बनने तक. पाकिस्तान वायु सेना उस समय इस्तेमाल किए गए उपकरण चलाता था."
"इसके बाद दूसरा चरण रहा जब पाकिस्तान सेंट्रल ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (CENTO) और साउथ इस्ट एशिया ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (SEATO) में शामिल हुआ. यह चरण भारत के ख़िलाफ़ लड़े गए 1965 के युद्ध तक चला. इस चरण में अमरीका के कई स्टार फाइटर जेट को शामिल किया गया, जिसमें एफ़ 86 और एफ़ 104 शामिल है. इस चरण में पाकिस्तान वायु सेना के सभी पायलट अमरीकी वायु सेना के साथ प्रशिक्षण लेते थे."
तीसरा चरण तब शुरू हुआ जब 1965 के युद्ध के बाद पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाए गए.
उन्होंने कहा, "इस चरण ने हमें विविधता दिखाई और प्रयास जारी है."
भारतीय वायु सेना के कुछ लोगों को लगता है कि पाकिस्तान की वायु सेना विकसित नहीं हो पाई है.
पिछले साल भारतीय वायु सेना के उपप्रमुख पद से रिटायर हुए एयर मार्शल एसबी देव कहते हैं, "पाकिस्तान की वायु सेना हमारी बराबरी करना चाहती है. उनके पायलट बहुत बुरे नहीं हैं लेकिन मेरी समझ में पाकिस्तान वायु सेना को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. उनकी वायु सेना अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए चीन की तरफ़ देख रही है."
इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा था कि "यह एक कुशल वायु सेना होनी चाहिए, जो किसी से भी पीछे नहीं हो और पाकिस्तान की रक्षा के लिए सेना और नौसेना के साथ खड़ा हो सके."
71 साल बाद आज पाकिस्तानी वायु सेना सुर्ख़ियों में है और स्थितियां सामान्य नहीं हैं.
बालाकोट के बाद भारत और पाकिस्तान की वायु सेना सक्रिय हैं और दोनों देशों ने एक-दूसरे के विमानों को मार गिराने का दावा किया है.
भारतीय वायु सेना दुनिया की चौथी बड़ी सेना है. उसके पास 31 लड़ाकू दस्ता है. एक लड़ाकू दस्ते में 17 से 18 जेट होते हैं.
वहीं पाकिस्तान अपने पास 20 लड़ाकू दस्ता होने का दावा करता है और इस तरह भारतीय वायु सेना पाकिस्तानी वायु सेना से कहीं आगे है.
लेकिन इस तरह की तुलना एक-दूसरे के शक्तिशाली होने की पूरी कहानी नहीं बताता है.
रॉयल पाकिस्तान वायु सेना के शुरुआती दिन बहुत अच्छे नहीं थे. इस बात का ज़िक्र पाकिस्तान के आधिकारिक इतिहास में किया गया है.
लिखा गया है, "बंटवारे के निर्णय के बाद आधिकारिक समझौते के तहत पाकिस्तान को हथियारों, उपकरणों और विमानों का वैध हिस्सा देने के बाद भी भारत ने तत्कालीन रॉयल पाकिस्तान वायु सेना को मानने से इंकार कर दिया था."
"भारत से जो भी मिला था उसमें से अधिकांश सही नहीं थे. उपकरणों के बक्से में रद्दी माल और बेकार चीज़ें थीं और कुछ नहीं था."
कश्मीर को लेकर 1947-48 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष के बाद पाकिस्तान वायु सेना की यात्रा की शुरुआत हुई.
1965 और 1971 में लड़े गए युद्धों के दौरान भारत और पाकिस्तान की वायुसेना ने सक्रिय भूमिका निभाई थी. यही कारण है कि दोनों देश की सेना इनके पराक्रमों को मान्यता देती है.
आज पाकिस्तान के एफ़-16 और जेएफ़-17 थंडर विमानों की बात हो रही है. एफ़-16 का निर्माण अमरीका करता है, वहीं जेएफ़-17 थंडर चीन की मदद से पाकिस्तान ने बनाया है.
एफ़-16 सिंगल इंजन लड़ाकू विमान है, जिसे पाकिस्तान ने पहली बार 1982 में अपनाया था. अभी पाकिस्तान के पास इसका चौथा जेनरेशन मॉडल है.
इसके मुक़ाबले जेफ़-17 कहीं हल्का और सभी तरह के मौसम में इस्तेमाल किया जाने वाला लड़ाकू विमान है. इसे दिन और रात कभी भी इस्तेमाल किया जा सकता है. यह 'मल्टी-रोल' लड़ाकू विमान है.
आने वाले सालों में यह पाकिस्तान वायु सेना का सबसे शक्तिशाली विमान होगा, जो फ्रांस के मिराज जैसे पुराने विमानों की जगह ले लेगा.
पाकिस्तान वायु सेना जेएफ़-17 की पांचवी पीढ़ी को विकसित कर रहा है जो और भी उन्नत संस्करण होगा. हालांकि इस बारे में बहुत कम सुना और देखा गया है.
पाकिस्तान वायु सेना तीन जगहों से अपना नियंत्रण क़ायम करता है- पेशावर, लाहौर और कराची. इसके अलावा इसका एयर डिफेंस कमांड रावलपिंडी में है और स्ट्रैटेजिक कमांड इस्लामाबाद में है.
पाकिस्तान दावा करता है कि उसके पास एयर रडार, जटिल रख रखाव की सुविधाएं और उसे लॉन्च करने का बेहतर सेटअप नेटवर्क है.
हालांकि ये दावे मई 2011 में धरे रह गए थे, जब अमरीकी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान से पाकिस्तान में घुस कर ओसामा बिन लादेन को मारा था.
पाकिस्तान वायु सेना उस समय अमरीकी घुसपैठ का पता नहीं लगा सकी थी, जिसने सभी को चौंका दिया था.
पिछले साल कैलिफोर्निया के थिंकटैंक रंद कोऑर्पोरेशन ने कहा था, "पाकिस्तान वायु सेना के नीतिगत निर्णय थल सेना लेती है. ये निर्णय वायु सेनाध्यक्ष की सलाह पर लिए जाते हैं. इसलिए वायु सेना के असल निति निर्धारक वायु सेना अध्यक्ष नहीं, थल सेना अध्यक्ष होते हैं."
इसका वायु सेना पर क्या असर होता है?
पाकिस्तान वायु सेना के पूर्व एयर ऑपरेशन डायरेक्टर और लेखक क़ैसर तुफ़ैल कहते हैं, "दुनिया में कोई भी वायु सेना ऐसी नहीं है, जिसके पास वो सबकुछ है जो वह चाहता है. कुछ मायनों में आर्थिक ज़रूरत कभी पूरी नहीं होती, क्या ऐसा नहीं है? लेकिन मैं उन सभी से असहमत हूं जो यह कहता है कि पाकिस्तान वायु सेना को उसका हक़ नहीं मिलता है."
पाकिस्तान वायु सेना के विकास के बारे में वो बताते हैं, "मेरे हिसाब से पाकिस्तान वायु सेना का विकास तीन चरणों से गुज़रा है. पहला, पाकिस्तान के गणतंत्र बनने तक. पाकिस्तान वायु सेना उस समय इस्तेमाल किए गए उपकरण चलाता था."
"इसके बाद दूसरा चरण रहा जब पाकिस्तान सेंट्रल ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (CENTO) और साउथ इस्ट एशिया ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (SEATO) में शामिल हुआ. यह चरण भारत के ख़िलाफ़ लड़े गए 1965 के युद्ध तक चला. इस चरण में अमरीका के कई स्टार फाइटर जेट को शामिल किया गया, जिसमें एफ़ 86 और एफ़ 104 शामिल है. इस चरण में पाकिस्तान वायु सेना के सभी पायलट अमरीकी वायु सेना के साथ प्रशिक्षण लेते थे."
तीसरा चरण तब शुरू हुआ जब 1965 के युद्ध के बाद पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाए गए.
उन्होंने कहा, "इस चरण ने हमें विविधता दिखाई और प्रयास जारी है."
भारतीय वायु सेना के कुछ लोगों को लगता है कि पाकिस्तान की वायु सेना विकसित नहीं हो पाई है.
पिछले साल भारतीय वायु सेना के उपप्रमुख पद से रिटायर हुए एयर मार्शल एसबी देव कहते हैं, "पाकिस्तान की वायु सेना हमारी बराबरी करना चाहती है. उनके पायलट बहुत बुरे नहीं हैं लेकिन मेरी समझ में पाकिस्तान वायु सेना को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. उनकी वायु सेना अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए चीन की तरफ़ देख रही है."
Subscribe to:
Posts (Atom)